स्त्री - एक यज्ञ


शहर ,गांव ,गली-कूचों से हर रोज सुनाई देती है,
हर कोने से एक औरत इज़्ज़त की दुहाई देती है।
जब कहीं किसी काली रात तले,
औरों की पोती कालिख को ,
एक औरत अपने सीने पर ढोती है,
विनाश के बीज को इस धरती के गर्भ में बोती है।
पी-पी कर स्त्रियों का रक्त धारा ये सिंचित होती है।
गैरत हो मन में लेश मात्र भी शेष अगर,
क्यों न मुझको इन आँखों मे दिखाई देती है।

बिलख-बिलख कर जब कुचली बच्ची कोई रोती है,
काली पूजन की बात कहीं न होती है।
लक्ष्मी पूजन यूँ तो सबको भाय है,
लक्ष्मी पैदा होने पर कचरे में उसको बहाय है।
पाप ये रिस-रिस कर इस समाज को सींचे है,
मदत को बढ़ने वाले हाथों को भी भींचे है।

जिस घर के निर्माण का दम्भ भरा तेरा मन में,
उसकी नींव टिकी है औरत के नाज़ुक तन में।
जिस दिन मिट जाएगी,तेरी हस्ती भी लेकर जाएगी,
एक डोर है जिससे तू बंधा इसी औरत के वजूद से,
उसके बिन ये घर, ये लोभ, ये दुनिया न तुझको भाएगी।

अन्नपूर्णा का पूजन करते हो हर कौर के बाद,
घर की औरत खायेगी सबके खाने के बाद,
विचित्र नियम ये,
लोगों के मन में जमी ये कैसी मैली गाद?

वर्तमान की कीमत पर पुरातन नियम को ढोते हैं,
और भविष्य को ज़र्ज़र धागे में पिरोते हैं।
पूजन माला सा शुद्ध-सरल औरत का जीवन,
अपनी महक से घर-आँगन महकाती है।
दुनिया ये उसको कमजोर बताती है,
और,
बल पाने को पूजन शक्ति का करती है।
स्वयं को ही हँसी का पात्र बनाती है।

जितने भी हैं देव यहाँ,
स्वयं आप में हैं अधूरे,
शिव-शक्ति को,विष्णु-लक्ष्मी को ही पाकर,होते हैं पूरे।
देव तुम्हारे टिक न पाए,
काली को शान्त कराने शिव पैरों के नीचे आये,
मिटा नहीं उनका सम्मान,
तुम तो केवल इंसान।

याद रहे, स्त्री मात्र नहीं सम्मान,
उसकी कीमत को तू पहचान।
स्वतंत्र वजूद है उसका,बंधन उसकी इच्छा है।
कमज़ोर है नारी , ये मिथ्या है।।
     -प्रिंसी मिश्रा




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